राजनीति से जुड़ना अब एक मजबूरी सी हो गई है कारण है मताधिकार जो प्रजातंत्र में एक आम आदमी का सबसे बड़ा अधिकार है। देश का प्रत्येक नागरिक की सरकार बनाने में भागीदारी होती है। लोगों को भी इस अधिकार की ताकत का पता चल गया है। इसलिये चुनावी माहौल में अक भिखारी से लेकर सेठ सब बराबर हो जातें हैं और चुनाव एक मेले के समान हो गया है लोग समझ चुके हैं कि की चुनाव के बाद तो कुछ आने वाला नहीं सो सो समय रहते ही अपने वोट की कीमत वसूलना चाहतें हैं।

जहाँ इस चुनावी माहौल में वोटरों की मौज होती है तो दूसरी तरफ हर गली मोहल्ले का प्रधान, मंदिर मस्जिदों के पुजारी मौलवी N G O वाले गलियों के नेता सभी वोट के दलालों की भूमिका निभाते हैं। उम्मीदवारों के संपर्क में ऐसे लोगों का तांता लगा रहता है।

मैंने स्वयं चुनाव लडा है मेरे पास भी ऐसे आफर आफर आते रहते थे हैरानी तो तब हुई जब एक निक्कमे शराबी से मुलाकात हुई उसका आफर था की 10000 से ज्यादा वोट दिलाउगां बस बीस पच्चीस हजार की शराब बांटनी होगी हरियाणा से लायेंगे तो काम और सस्ते में हो जायगा। मंदिरों में जागरण गुरूद्वाराो में भोग रोजा ईफ्त्यार पार्टी आदि का आयोजन बहुत साधारण बात है। धर्म और समाज सेवा के नाम पर वोटों का धंधा किया जाता है। इन अधिभारो का बोझ जनता को ही चुकाना पड़ता है।

हर सरकार आते ही सिस्टम में फेरबदल करती है इस बदलाव की आड में फिर एक बार बडा धंधा किया जाता है फलस्वरूप जनता को बढे हुए टैक्स व मंहगाई की मार झेलनी पड़ती है। चालिस से ज्यादा की उम्र हो गई मैंने तो कभी चीजों को सस्ता होते नहीं कीमतें सिर्फ उन चीजों की घटी है जो चीजें चीन से आयात होने लगी हैं। उसका खामियाजा भी हम बिगड़ती हुई आर्थिक व्यवस्था और सैनिकों की जान देकर चुका रहे हैं।

गलती सिर्फ नेताओं की नहीं
जनता भी गलत है कहीं

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here