इन चोरों को पहले से ही पता था कि विदेशी नस्ल की गायों का दूध पीने योग्य नहीं है।

70 के दशक में जब भारत में ऑपरेशन फ्लड या श्वेत क्रांति की शुरुआत हुई तो भारतीय नस्ल की गायों पर दूध कम उत्पाद होने की बात कही गई ।

उत्पादन में वृद्धि के लिए विदेशी नस्ल की जर्सी और हॉल्स्टीन फ़्रिसियन जैसी गायों को भारत लाया गया. गौशालों और किसानों के घरों में विदेशी गायों को अहमियत मिलने लगी और भारतीय नस्ल की गायें सड़कों और गलियों में आवारा फिरने को मजबूर हो गई

देश में श्वेत क्रांति लाने के नाम पर हमारे नीति निर्माता विदेशी नस्ल की गायों को भारत में ले तो आए लेकिन उन्होंने इस से पहले यह पता करने की कोशिश नहीं की, कि कैसे वे भारतीय नस्ल की गायों की उत्पादकता को बढ़ा सकते हैं.

आप तो जानते है कि स्थानीय परिस्थितियों में भारतीय नस्ल की गायें ज्यादा अनुकूल है. उन्हें कम पानी चाहिए, उनमें गर्मी झेलने की ज्यादा क्षमता है, वे ज्यादा दूर तक चल सकती हैं, स्थानीय घास को खाकर जी सकती हैं और उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की बीमारियों के प्रति उनमें प्रतिरोधक क्षमता होती है. अगर इन गायों को खुराक और वातावरण मिले तो ये दुग्ध उत्पादन में भी अव्वल हो सकती हैं.।

इसका जीता जागता उदाहरण ब्राजील देश है। जिसने भारतीय नस्ल की गीर प्रजाति की गाय पर संवर्धन पर काम कर इसे एक दिन में 74.390 लीटर दूध देने वाली गाय का कीर्तिमान प्राप्त किया। ये काम हमारे नीति निर्माता भी कर सकते थे। लेकिन इनकी लूट नीतियों ने हमारी भारतीय देशी गाय को तो खत्म किया ही साथ की साथ भारत को भी बीमार कर दिया है। आज भारत का हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार। है।कारण शुद्ध दूध ना मिलना।

एक बात तो तय है कि इन चोरों को पहले से ही पता था कि विदेशी नस्ल की गायों का दूध पीने योग्य नहीं है।

फिर भी भारत में लेकर आये और अगर नहीं लाते तो आज जो एलोपैथी से करोड़ों रुपये कमा रहे हैं वो नहीं कमा पाते
तो भाई लोगों देशी गाय को अपनाओ और देश बचाओ।
#गौहत्याबंदकरो_सरकार

( by Swami Aaditya Pashupati )

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