महाराष्ट्र : पालघर में फिर साधुओं पर हमला -भगवान दास

पालघर जिले के वसई तालुका गांव में बुधवार रात एक मंदिर के पुजारी और उसके सेवाकर्मी पर हमला हुआ। हमलावर इसके बाद मंदिर की दानपेटी से नकदी और अन्य सामान लेकर भाग निकले।
घटना बुधवार रात साढ़े 12 बजे की है। पालघर जिला के वसई तालुका के भालिवली इलाके में मुंबई-अहमदाबाद महामार्ग डोंगर स्थित शिव मंदिर के पुजारी और सहकर्मी के ऊपर बुधवार की रात 12.30 बजे के करीब 3 हमलावरों ने हमला किया और दान पेटी समेत नकदी और अन्य समान लेकर भाग निकले।नांदेड़ में संत और उनके सेवादार की निर्मम हत्या। पालघर से लेकर नांदेड़ तक जारी हत्या की शृंखलाओं में कई संत अपनी जान गंवा चुके हैं। पंजाब में भी संत योगेश्वर की निर्मम हत्या हुई, होशियारपुर में संत पुष्पिंदर महाराज पर जानलेवा हमला हुआ, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में दो साधुओं की हत्या हुई। निहत्थे संतों की हत्या की घटनाएं रुक क्यों नहीं रही हैं? केन्द्र और राज्य सरकारें निहत्थे संतों की हत्या रोकने के लिए गंभीर क्यों नहीं हैं?
जनाक्रोश को शांत करने के लिए संतों की हत्याओं पर पर्दा डालने का काम हो रहा है और संगठित अपराध, संगठित साजिश को ढका-तोपा रहा है? क्या सरकारें उस समय का इंतजार कर रही हैं जब साधु-संत वर्ग सड़कों पर उतर कर किसी अभियान की शुरुआत कर दे। साधु-संत को भी हिंसाविहीन अपना जीवन जीने का अधिकार है। जिस तरह मॉब लिंचिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों को निर्देश दिये हैं, केंद्रीय सरकार ने भी मॉब लिंचिंग पर दिशा-निर्देश जारी किये हैं, उसी प्रकार संतों की हत्या पर भी केन्द्रीय सरकार और सुप्रीम कोर्ट को गंभीर हो जाना चाहिए।
आमतौर पर ऐसी दूसरी हत्याओं की शृंखला पर राजनीति भी गर्मा जाती है, राजनीतिक बहस का विषय बन जाती हैं पर राजनीति भी न तो अभियानी है और न ही राजनीति इन हत्याओं को विमर्श और बहस में लाना चाहती है। जबकि संतों की हत्याएं गंभीर साजिश की ओर इंगित करती हैं।
महाराष्ट्र के पालघर से लेकर नांदेड़ तक जितनी भी हत्याएं हुईं हैं, उन हत्याओं की परिस्थिति देखने से राज्य सरकारों और उनकी पुलिस पर उंगलियां उठनी स्वाभाविक हैं। जब आप हत्या की परिस्थितियों का विश्लेषण करेंगे तो पता चल जायेगा कि पुलिस कुछ न कुछ जरूर छिपा रही है और साजिश के गुनहगारों को बचाना चाहती है। पालघर में दो साधुओं और उनके चालकों की हत्या की परिस्थितियां भी देख लीजिये। पुलिस का कहना है कि पालघर की घटना क्षणिक अपराध का प्रश्न है, ग्रामीण फसल चोरों से परेशान थे, साधुओं को फसल चोर समझ लिया गया था। जिन साधुओं की हत्या हुई है, वे साधु अपनी कार में सवार थे और गेरुआ वस्त्रधारी थे। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि फसल चोर क्या कार में चोरी करने जाते हैं और गेरुआ वस्त्र पहन कर जाते हैं? क्या कोई वृद्ध भी जो ठीक तरह से चल फिर नहीं सकता है वह भी चोरी करने जाता है? क्या चोरी करने जाने वाले लोग निहत्थे होते हैं? क्या पालघर के ग्रामीणों ने कभी साधु-संत नहीं देखे थे? साजिश नहीं होती तो ये साधुओं को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर देते। 70 साल के महाराज कल्पवृक्षगिरि और 35 साल के सुशील गिरि जूना अखाड़ा से जुड़े हुए थे। जूना अखाड़ा का साफ कहना है कि उनके संतों की हत्या एक गहरी साजिश के तहत हुई है। पालघर जहां पर हत्या की घटना घटी है, वह क्षेत्र ईसाई मिशनरी के प्रभाव क्षेत्र में आता है।
महाराष्ट्र के नांदेड़ में संत सद‍्गुरु शिवाचार्य नागठणकर महाराज और उनके सेवादार भगवान शिंदे की हत्या कर दी गयी है। पुलिस ने इस घटना को दबाने के लिए चोरी का हथकंडा बता दिया। पुलिस का कहना है कि चोरी की दृष्टि से आश्रम में घुस कर हत्या की गयी है। हत्यारे को नशेड़ी घोषित कर दिया गया। पंजाब के अंदर एक संत, जिनका नाम महात्मा योगेश्वर था। उनके आश्रम में घुस कर उनका तेज हथियार से धड़ अलग कर दिया गया था। महात्मा योगेश्वर वृद्ध थे। इस हत्या का कोई सुराग तक नहीं मिला है। पंजाब के होशियारपुर में एक संत हैं पुष्पिंदर महाराज। पुष्पिंदर महाराज पर रात में जानलेवा हमला हुआ, वे किसी तरह अपनी जान बचाने में कामयाब हुए। पंजाब पुलिस कहती है कि पुष्पिंदर महाराज पर हमला किसी सिरफिरे या फिर नशेड़ी गिरोह का हाथ हो सकता है। पंजाब में थोड़े से अंतराल में कई हिन्दू नेताओं की हत्या हुई थी, जब जांच आगे बढ़ी और सरकार ने ईमानदारी दिखायी तो सच सामने आ गया। पाकिस्तान परस्त गिरोह ने हिन्दू नेताओं की हत्या एक साजिश के तौर पर की थी, उनका एक ही मकसद घृणा का वातावरण बनाकर शांति-सद‍्भाव को प्रभावित करना था।
देश की राजनीति का एक वर्ग संतों से घृणा करता है, उनके घृणा की कसौटी राजनीति ही है, वोट बैंक की मानसिकताएं हैं। राजनीति के एक बड़े वर्ग ने यह मान लिया है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत संत ही हैं। संत ही भाजपा को सत्तासीन करने में भूमिका निभाते हैं। अगर ऐसे विचार अपनी भूमिका नहीं निभाते होते तो फिर निहत्थे और निरीह श्रेणी के संतों की हत्या पर देश में तूफान खड़ा कर दिया जाता। तथाकथित विदेशी मानवाधिकार संस्थाएं भी भारत के खिलाफ आग उगलना शुरू कर देतीं

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